आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों के कथित तौर पर बीजेपी में “विलय” के दावे ने बड़ा संवैधानिक विवाद खड़ा कर दिया है। इस सूची में राघव चड्ढा का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। AAP ने इस पूरे घटनाक्रम को गैर-कानूनी बताते हुए राज्यसभा के सभापति को पत्र लिखकर सभी सातों सांसदों की सदस्यता रद्द करने की मांग की है। पार्टी का कहना है कि सांसद व्यक्तिगत रूप से किसी दूसरी पार्टी में “विलय” नहीं कर सकते। इसके लिए संवैधानिक प्रावधानों के तहत स्पष्ट नियम तय हैं, जिनका पालन इस मामले में नहीं किया गया है। सूत्रों के अनुसार, AAP को अब तक केवल तीन सांसदों के ही इस्तीफे प्राप्त हुए हैं। ऐसे में बाकी सांसदों की स्थिति और भी सवालों के घेरे में आ गई है। AAP के राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कहा कि यह मामला सीधे तौर पर संविधान और कानून के उल्लंघन से जुड़ा है। उन्होंने कहा, “नियमों के मुताबिक इस तरह का विलय संभव नहीं है, इसलिए इन सभी सांसदों की सदस्यता रद्द की जानी चाहिए।” आम आदमी पार्टी ने वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल से भी कानूनी सलाह ली है। सिब्बल ने स्पष्ट किया कि कोई भी सांसद व्यक्तिगत रूप से पार्टी विलय का फैसला नहीं कर सकता। उनके अनुसार: विलय का निर्णय या तो पार्टी स्तर पर होता है या दो दल आपसी सहमति से विलय करते हैं व्यक्तिगत सांसदों को ऐसा अधिकार नहीं यह पूरा मामला दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) से जुड़ा है। इसके तहत: यदि कोई सांसद स्वेच्छा से पार्टी छोड़ता है, तो उसकी सदस्यता खत्म हो सकती है “विलय” तभी मान्य होगा, जब कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में शामिल हों कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये शर्तें पूरी नहीं होतीं, तो संबंधित सांसदों की सदस्यता पर खतरा मंडरा सकता है। फिलहाल यह मामला राज्यसभा के सभापति के पास विचाराधीन है। आने वाला फैसला न केवल इन सात सांसदों का राजनीतिक भविष्य तय करेगा, बल्कि दल-बदल कानून की व्याख्या पर भी अहम असर डाल सकता है।