नई दिल्ली: पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी की राजनीति एक बार फिर चर्चा का विषय बन गई है। बुधवार को जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी लोकसभा में अपना भाषण दे रहे थे, तब पंजाब कांग्रेस के सात सांसदों में से एक मात्र पूर्व मुख्यमंत्री और जालंधर से सांसद चरणजीत सिंह चन्नी सदन से नदारद रहे। उनकी अनुपस्थिति ने पार्टी के भीतर चल रहे आंतरिक मतभेदों को उजागर कर दिया है। चन्नी ने सदन में उपस्थित रहने के बजाय फरीदकोट में एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व करना चुना। यह घटनाक्रम ऐसे समय में हुआ है जब पार्टी आगामी चुनावों के मद्देनजर एकजुटता दिखाने की कोशिश कर रही है। पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी का इतिहास चरणजीत सिंह चन्नी और पंजाब कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग के बीच लंबे समय से तनातनी चल रही है। यह प्रतिद्वंद्विता पार्टी के भीतर गुटों में बंटे होने का एक स्पष्ट संकेत है। बुधवार को भी यह विभाजन तब और स्पष्ट हो गया जब वडिंग ने संसद के बाहर पंजाब के सांसदों के साथ मिलकर आप सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया, जिसमें वे परीक्षा धांधली के मुद्दे पर शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के इस्तीफे की मांग कर रहे थे। वहीं, चन्नी फरीदकोट में एक अलग विरोध प्रदर्शन में व्यस्त थे, जो उसी मुद्दे पर था। यह दर्शाता है कि दोनों नेता पार्टी के एजेंडे को अलग-अलग तरीके से आगे बढ़ा रहे हैं। कांग्रेस नेतृत्व ने पार्टी में एकता बनाए रखने के लिए कई प्रयास किए हैं। हाल ही में, पार्टी के चुनाव रणनीतिकार नरेश अरोड़ा ने दिल्ली में चन्नी और वडिंग के बीच एक गुप्त बैठक का आयोजन किया था, जैसा कि एनडीटीवी ने रिपोर्ट किया था। इस बैठक का उद्देश्य दोनों नेताओं के बीच की खाई को पाटना था। हालांकि, बुधवार को हुए अलग-अलग विरोध प्रदर्शनों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस बैठक का कोई खास असर नहीं हुआ है। दोनों नेता अपनी-अपनी राह पर चलते हुए पार्टी के भीतर अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी नेतृत्व के प्रयास और जमीनी हकीकत यह पहली बार नहीं है जब चन्नी और वडिंग ने अलग-अलग मंचों पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। इससे पहले सोमवार को भी पंजाब कांग्रेस के सांसदों ने वडिंग के नेतृत्व में संसद परिसर में राज्य के शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर विरोध प्रदर्शन किया था। उस विरोध प्रदर्शन में भी चन्नी और उनके समर्थक माने जाने वाले नेता सुखजिंदर सिंह रंधावा अनुपस्थित थे। यह लगातार हो रही अनुपस्थिति पार्टी के भीतर चल रहे असंतोष और नेतृत्व के प्रति अवज्ञा का संकेत देती है। पार्टी नेतृत्व ने इस मामले को सुलझाने के लिए कई कदम उठाए हैं। 1 जुलाई को, कांग्रेस नेतृत्व ने राजा वडिंग को राज्य अध्यक्ष के पद पर बनाए रखने का फैसला किया था। चरणजीत सिंह चन्नी को अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था, जबकि सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा को कोर कमेटी का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। इसके बावजूद, चन्नी और रंधावा के नेतृत्व में कई पंजाब कांग्रेस विधायकों और पूर्व उम्मीदवारों ने वडिंग को हटाने के लिए मोर्चा खोल दिया था। इस आंतरिक कलह को शांत करने के लिए, पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल चंडीगढ़ में एक सप्ताह तक डेरा डाले रहे थे। इसके बाद, संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने दिल्ली में पार्टी मुख्यालय में नाराज नेताओं, जिनमें चन्नी और रंधावा भी शामिल थे, को बुलाया और उन्हें अनुशासन बनाए रखने की सलाह दी। इस बैठक के बाद, चन्नी ने सार्वजनिक रूप से कहा कि वह पार्टी आलाकमान के फैसले के साथ हैं। बाद में, सभी वरिष्ठ पंजाब कांग्रेस नेताओं ने वेणुगोपाल द्वारा बुलाई गई एक बैठक में भाग लिया, जहां चन्नी और वडिंग एक साथ बैठे थे। पार्टी ने तब दावा किया था कि विवाद सुलझ गया है। हालांकि, विश्वसनीय सूत्रों के अनुसार, चन्नी और वडिंग के बीच बातचीत की स्थिति सामान्य नहीं है, और यह सुलह केवल एक फोटो-ऑप साबित हो रही है। चन्नी की अनुपस्थिति का महत्व राहुल गांधी के भाषण के दौरान चरणजीत सिंह चन्नी की अनुपस्थिति को कई मायनों में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह न केवल पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी को दर्शाता है, बल्कि पार्टी के भीतर नेतृत्व की स्थिति पर भी सवाल खड़े करता है। चन्नी, जो पहले पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके हैं, पार्टी में एक महत्वपूर्ण चेहरा हैं। उनकी अलग राह अपनाना पार्टी के लिए एक चुनौती पेश करता है, खासकर जब वह आगामी चुनावों की तैयारी कर रही है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि कांग्रेस नेतृत्व इस स्थिति से कैसे निपटता है। क्या वे चन्नी के खिलाफ कोई कार्रवाई करेंगे, या वे इस मुद्दे को नजरअंदाज करने की कोशिश करेंगे? भूपेश बघेल गुरुवार से पंजाब का एक और दौरा शुरू कर रहे हैं, जहां वह स्थानीय नेताओं से मिलेंगे। यह दौरा पंजाब कांग्रेस में चल रही अंदरूनी कलह को सुलझाने में कितना सफल होता है, यह देखना बाकी है। पार्टी के लिए यह आवश्यक है कि वह एकजुट होकर चुनाव लड़े, अन्यथा गुटबाजी का यह खेल उसे भारी पड़ सकता है।