लखनऊ/रामपुर। विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस के मौके पर शुक्रवार को लखनऊ में आयोजित एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने किसी का नाम लिए बिना यह आरोप लगाया कि सपा ऐसे लोगों को सत्ता में आने पर गृह मंत्री बनाने का सपना देख रही है, जिन्होंने देश के विभाजन की पटकथा लिखने वालों के नाम पर बड़े-बड़े विश्वविद्यालय खड़े किए हैं। मुख्यमंत्री का यह बयान सीधे तौर पर रामपुर से जुड़ जाता है, क्योंकि जिस शख्सियत की तरफ इशारा माना जा रहा है, उनका जन्म रामपुर में ही हुआ था। इस बयान ने राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा दी है और 2027 के चुनावों के मद्देनजर इसे एक महत्वपूर्ण राजनीतिक बयान के तौर पर देखा जा रहा है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में 1947 के बंटवारे को मानवता के इतिहास का सबसे काला अध्याय बताया। उन्होंने कहा कि उस भयावह दौर में सत्ता पाने की लालसा इतनी बढ़ गई थी कि एक अखंड राष्ट्र के टुकड़े कर दिए गए। इस विभाजन के कारण करोड़ों लोगों को अपनी ही जन्मभूमि छोड़नी पड़ी और लाखों लोगों को अपनी जान गंवानी पड़ी। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि जिन इलाकों की मांग तक नहीं की गई थी, वे भी बंटवारे में चले गए, जिससे देश की अखंडता को गहरा आघात पहुंचा। यह बयान विभाजन की त्रासदी को रेखांकित करता है और इसके दीर्घकालिक परिणामों पर प्रकाश डालता है। विभाजन विभीषिका दिवस पर सीएम योगी का संबोधन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री ने 1947 के बंटवारे की त्रासदी को याद करते हुए कहा कि यह मानवता के इतिहास का सबसे काला अध्याय था। उन्होंने कहा कि सत्ता की लालसा ने एक अखंड राष्ट्र को विभाजित कर दिया, जिससे करोड़ों लोग विस्थापित हुए और लाखों लोग मारे गए। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि जिन इलाकों की मांग तक नहीं की गई थी, वे भी बंटवारे में चले गए। उन्होंने मौजूदा राजनीति पर लौटते हुए विपक्ष को घेरा और कहा कि जो दल वोट बैंक खिसकने के डर से ऐसे मुद्दों पर चुप रह जाते हैं, वे देश के साथ न्याय नहीं करते। यह बयान समाजवादी पार्टी के उन रुख पर कटाक्ष था जो अक्सर संवेदनशील राष्ट्रीय मुद्दों पर चुप्पी साधे रहती है। मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि जो दल वोट बैंक की राजनीति के चलते ऐसे मुद्दों पर चुप रह जाते हैं, वे देश के साथ न्याय नहीं करते। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे लोग देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा हैं। कार्यक्रम से पहले मुख्यमंत्री ने हज़रतगंज स्थित सरदार पटेल की प्रतिमा से लोकभवन तक पदयात्रा में हिस्सा लिया और विभाजन के दौर पर आधारित एक प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया। इस महत्वपूर्ण अवसर पर उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक समेत कई मंत्री, सांसद और विधायक तथा विस्थापित परिवारों के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे। कार्यक्रम में पंजाबी और सिंधी समाज के लोगों ने बंटवारे से जुड़े अपने मार्मिक अनुभव साझा किए, जिससे माहौल भावुक हो गया। शिवपाल यादव के बयान से गरमाया मामला मुख्यमंत्री की यह तीखी टिप्पणी अचानक नहीं आई। इससे कुछ दिन पहले समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव शिवपाल सिंह यादव ने रामपुर में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आज़म खान से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद शिवपाल सिंह यादव ने एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि 2027 में सपा की सरकार बनने पर आज़म खान को गृह मंत्री बनाया जाएगा। शिवपाल ने यह भी कहा था कि मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण में पार्टी के सांसदों और विधायकों ने आर्थिक मदद दी थी, और उन्होंने आज़म खान को एक शिक्षाविद के रूप में पेश किया था। यह बयान मुख्यमंत्री के निशाने पर आ गया। इसी बयान के जवाब में मुख्यमंत्री ने विश्वविद्यालय और उसके नाम को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से आज़म खान और जौहर यूनिवर्सिटी पर निशाना साधा। गौरतलब है कि रामपुर की मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी को लेकर पहले से ही कई कानूनी मामले अदालतों में चल रहे हैं, जिनमें भूमि अधिग्रहण और अन्य अनियमितताओं के आरोप शामिल हैं। इन मामलों ने विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को प्रभावित किया है और यह राजनीतिक बहस का एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। मुख्यमंत्री का बयान इन कानूनी विवादों के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। कौन थे मौलाना मोहम्मद अली जौहर? मौलाना मोहम्मद अली जौहर का जन्म 10 दिसंबर 1878 को रामपुर में हुआ था। उनकी माता आबादी बानो बेगम को देशभर में 'बी-अम्मा' के नाम से जाना जाता है, जो खुद स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहीं और उन्होंने महिलाओं को आंदोलन में भाग लेने के लिए प्रेरित किया। मौलाना जौहर ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा रामपुर में प्राप्त की और उच्च शिक्षा के लिए अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय गए। इसके बाद उन्होंने इंग्लैंड में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से भी शिक्षा प्राप्त की। वे एक कुशल पत्रकार, एक ओजस्वी वक्ता और एक प्रख्यात कवि थे। पत्रकारिता के क्षेत्र में उन्होंने 'कॉमरेड' और 'हमदर्द' जैसे महत्वपूर्ण समाचार पत्रों का संपादन किया, जिनसे उन्होंने राष्ट्रीय मुद्दों पर अपनी आवाज उठाई। जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय की स्थापना में उनकी अहम भूमिका रही, जो आज भी उच्च शिक्षा के एक प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में जाना जाता है। राजनीति में उन्होंने 1906 में मुस्लिम लीग के सदस्य के रूप में अपनी यात्रा शुरू की और आगे चलकर वे लीग के अध्यक्ष भी बने। 1919 में वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़े और खिलाफत आंदोलन के प्रमुख चेहरों में से एक गिने गए। 1923 में उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया, जो भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में उनके महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाता है। 4 जनवरी 1931 को लंदन में गोलमेज सम्मेलन के दौरान उनका निधन हो गया और उन्हें यरुशलम में मस्जिद अल-अक्सा परिसर में दफ़्न किया गया। तारीखों का सवाल और राजनीतिक बहस मुख्यमंत्री के बयान के बाद यह बहस भी शुरू हुई है कि मौलाना जौहर को विभाजन से कितना जोड़ा जा सकता है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्यात्मक बिंदु है कि मुस्लिम लीग ने अलग देश की औपचारिक मांग 23 मार्च 1940 को अपने लाहौर अधिवेशन में रखी थी। वहीं, मौलाना जौहर का निधन उससे नौ साल पहले, 1931 में ही हो चुका था। मुख्यमंत्री के बयान को उनके मुस्लिम लीग से जुड़ाव के आधार पर देखा जा रहा है, जबकि दूसरी तरफ उन्हें एक स्वतंत्रता सेनानी और कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में याद करने वाला पक्ष इन तारीखों की तरफ ध्यान दिला रहा है। यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या किसी व्यक्ति के शुरुआती राजनीतिक जुड़ाव को उसके पूरे जीवन और योगदान पर हावी माना जा सकता है। समाजवादी पार्टी की ओर से इस बयान पर अभी तक कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन पार्टी के नेताओं के बीच इस पर चर्चा जारी है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सपा इस मुद्दे पर कैसे प्रतिक्रिया देती है और क्या वे अपने नेताओं के बयानों का बचाव करते हैं या मुख्यमंत्री के आरोपों को स्वीकार करते हैं। यह राजनीतिक टकराव 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के लिए एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार कर रहा है, जिसमें रामपुर और आसपास के क्षेत्र एक बार फिर चर्चा के केंद्र में होंगे। रामपुर में इस मुद्दे के मायने रामपुर के लिए यह मुद्दा सिर्फ़ बयानबाज़ी भर नहीं है, बल्कि यह शहर की पहचान और राजनीति से गहराई से जुड़ा हुआ है। मौलाना जौहर इस शहर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े एक महत्वपूर्ण नाम हैं। उनके नाम पर बना विश्वविद्यालय, मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी, ज़िले की राजनीति का सबसे बड़ा और विवादास्पद मुद्दा रहा है। इस विश्वविद्यालय को लेकर कई तरह के आरोप और विवाद जुड़े रहे हैं, जिन्होंने इसे राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बनाया है। 2027 के विधानसभा चुनाव नज़दीक आने के साथ, आज़म खान, जौहर यूनिवर्सिटी और रामपुर की सियासत एक बार फिर प्रदेश की राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि यह राजनीतिक टकराव रामपुर की स्थानीय राजनीति को कैसे प्रभावित करता है और आगामी चुनावों में इसका क्या असर पड़ता है। समाजवादी पार्टी के लिए यह एक संवेदनशील मुद्दा है, क्योंकि आज़म खान पार्टी के एक प्रमुख मुस्लिम चेहरा हैं और जौहर यूनिवर्सिटी उनके राजनीतिक प्रभाव का प्रतीक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यह बयान समाजवादी पार्टी पर दबाव बनाने की एक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है, जिसका उद्देश्य उनके वोट बैंक को प्रभावित करना है। रामपुर न्यूज़ इस घटनाक्रम पर अपनी पैनी नज़र बनाए रखेगा।