संपादकीय

“आज़ादी के बाद बदली पहचान: क्या हम ‘भारतीय’ से ‘हिंदू-मुस्लिम’ बन गए?”

भारत का इतिहास सिर्फ संघर्ष और बलिदान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साझा पहचान की भी कहानी है, जिसने सदियों तक विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधकर रखा। एक समय था जब हम सभी “भारतीय” थे—एक ऐसी पहचान जो हर भेदभाव से ऊपर थी। लेकिन आज़ादी के बाद, क्या हमने उस एकता को कहीं खो दिया?

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट पढ़ने का समय
“आज़ादी के बाद बदली पहचान: क्या हम ‘भारतीय’ से ‘हिंदू-मुस्लिम’ बन गए?”
भारत का इतिहास सिर्फ संघर्ष और बलिदान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साझा पहचान की भी कहानी है, जिसने सदियों तक विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधकर रखा। एक समय था जब हम सभी “भारतीय” थे—एक ऐसी पहचान जो हर भेदभाव से ऊपर थी। लेकिन आज़ादी के बाद, क्या हमने उस एकता को कहीं खो दिया? ब्रिटिश शासन के दौरान, “फूट डालो और राज करो” की नीति ने समाज में धर्म और जाति के आधार पर दरारें डालने की कोशिश की। फिर भी, उस दौर में जब देश गुलाम था, तब हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई सभी ने मिलकर आज़ादी की लड़ाई लड़ी। 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ अलग-अलग समुदायों ने एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ आवाज़ उठाई। लेकिन जैसे-जैसे आज़ादी करीब आई, वैसे-वैसे विभाजन की राजनीति तेज होती गई। भारत का विभाजन ने न सिर्फ देश को दो हिस्सों में बांटा, बल्कि लोगों के दिलों में भी गहरी खाई पैदा कर दी। एक ही मिट्टी में पले-बढ़े लोग अचानक “हिंदू” और “मुस्लिम” की पहचान में बंट गए। यह विभाजन सिर्फ भौगोलिक नहीं था, बल्कि भावनात्मक और सामाजिक भी था। आज, आज़ादी के इतने वर्षों बाद भी, हम अक्सर धर्म और पहचान के मुद्दों में उलझ जाते हैं। राजनीति, मीडिया और सामाजिक माहौल कई बार इस विभाजन को और गहरा कर देते हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या हमने आज़ादी के असली मायने समझे? आज़ादी का मतलब सिर्फ अंग्रेजों से मुक्ति नहीं था, बल्कि यह एक ऐसे समाज का निर्माण करना था जहाँ सभी नागरिक बराबरी और भाईचारे के साथ रह सकें। अगर हम आज भी अपने आप को सिर्फ धर्म के चश्मे से देखते हैं, तो कहीं न कहीं हम उस आज़ादी के उद्देश्य से भटक रहे हैं। हमें यह याद रखना होगा कि हमारी असली ताकत हमारी विविधता में छिपी एकता है। भारत की पहचान उसकी “गंगा-जमुनी तहज़ीब” है, जहाँ अलग-अलग धर्म और संस्कृतियाँ मिलकर एक खूबसूरत तस्वीर बनाते हैं। अंततः, यह हम पर निर्भर करता है कि हम खुद को किस रूप में देखना चाहते हैं—सिर्फ हिंदू या मुस्लिम के रूप में, या एक सच्चे भारतीय के रूप में। क्योंकि जब हम एक थे, तब हमने आज़ादी हासिल की थी; और जब हम फिर से एक होंगे, तभी हम देश को आगे बढ़ा पाएंगे।
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