संपादकीय और विशेष लेख

संपादकीय, विचार, रिव्यू, इंटरव्यू और विशेष रिपोर्ट – गहराई से समझने के लिए चुने हुए लेख।

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नीतीश कुमार की विदाई: एक राजनीतिक यथार्थ पर सवाल
✦ संपादक की पसंद
संपादकीय

नीतीश कुमार की विदाई: एक राजनीतिक यथार्थ पर सवाल

नीतीश कुमार का राजनैतिक सफर बिहार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। दो दशकों से भी अधिक समय तक मुख्यमंत्री पद पर रहने वाले नीतीश ने न केवल अपने समर्थकों को, बल्कि पूरे राज्य को अपनी राजनीतिक सूझबूझ और रणनीति से प्रभावित किया है। लेकिन जब से उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देकर राज्यसभा का रास्ता चुना है, एक सवाल बार-बार उठ रहा है: क्या उनकी विदाई इतनी सादगी और अस्पष्टता के साथ होनी चाहिए थी?

Mohd Zeeshan Raza Khan·
अफवाहों का खतरनाक असर: सामूहिक घबराहट से बचें
स्पेशल रिपोर्ट

अफवाहों का खतरनाक असर: सामूहिक घबराहट से बचें

अफवाहों के जाल से बचकर सामाजिक स्थिरता बचाएंहाल ही में कुछ आधारहीन अफवाहों ने लोगों में इतना डर पैदा कर दिया है कि पेट्रोल पंपों पर भीड़ लगने लगी है, खासकर ईरान और इज़राइल के बीच बढ़ते युद्ध की अफवाहों के चलते। बिना किसी पक्की जानकारी के फैली इन अफवाहों ने न सिर्फ लोगों को अस्थिर किया,

Mohd Zeeshan Raza Khan··1 मिनट
समाज में बदलाव: अच्छाई और बुराई के बीच संतुलन की खोज
संपादकीय

समाज में बदलाव: अच्छाई और बुराई के बीच संतुलन की खोज

समाज में क्रांतियाँ और बदलाव सदैव से एक दोधारी तलवार रहे हैं—जहाँ एक तरफ सामाजिक क्रांति ने नई अच्छाइयों का द्वार खोला, वहीं दूसरी तरफ कुछ आंदोलन और बुराइयों को भी जन्म देते हैं। समाजिक अच्छाइयों का उदाहरण

Mohd Zeeshan Raza Khan··1 मिनट
"गुलामी की पुरानी सोच: जब 'विश्व गुरु' बनना 'विश्व चेला' बनने में बदल गया"
संपादकीय

"गुलामी की पुरानी सोच: जब 'विश्व गुरु' बनना 'विश्व चेला' बनने में बदल गया"

"हमने सदियों तक 'विश्व गुरु' बनने का सपना देखा था, लेकिन आज का भारत एक बार फिर उसी पुरानी मानसिकता में फंसता दिख रहा है। सोच वही है, चरित्र वही है—जहाँ गुलामी का इतिहास अभी भी जिंदा है, और चाटुकारिता की राजनीति ने एक बार फिर से जगह बना ली है। जब हम सावरकर जैसे प्रतीकों के बारे में सोचते हैं, तो हमें याद रखना होगा कि उनके विचार आज भी जीवित हैं, उनके वारिस नए चेहरे के रूप में सामने आ रहे हैं। यदि हमें सच में एक स्वतंत्र, प्रगतिशील राष्ट्र बनना है, तो हमें इस बंद मानसिकता को तोड़ना होगा और एक नई दिशा में कदम बढ़ाना होगा।"

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट
शीर्षक: छोटी बातें, गहरी सोच का आधार
संपादकीय

शीर्षक: छोटी बातें, गहरी सोच का आधार

परिचय: हम अक्सर जीवन में बड़ी-बड़ी बातों, भाषणों और शब्दों के विस्तार में खो जाते हैं, लेकिन सच्ची गहराई वहीं है, जहां छोटी-छोटी बातें अपना असर दिखाती हैं। यह संपादकीय इसी सत्य की खोज करता है।

Mohd Zeeshan Raza Khan··1 मिनट
युद्ध का अंधेरा: बाजार और घरों की टूटती नींव
संपादकीय

युद्ध का अंधेरा: बाजार और घरों की टूटती नींव

युद्ध का असर सिर्फ सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह हमारे घरों और बाजारों की बुनियादों को भी हिला देता है। यह संपादकीय दर्शाता है कि कैसे युद्ध से व्यापार और रोज़मर्रा की ज़िंदगी दोनों असुरक्षित हो जाते हैं, और हमें कैसे अपने सपनों और रिश्तों की सुरक्षा करनी चाहिए ताकि हम एक नई शुरुआत कर सकें।

Mohd Zeeshan Raza Khan··1 मिनट
भारत की राजनीति, महंगाई और तकनीकी बदलाव: एक नया मोड़
विचार

भारत की राजनीति, महंगाई और तकनीकी बदलाव: एक नया मोड़

इन दिनों भारत में राजनीतिक गतिविधियों ने एक नई ऊर्ज़ा पकड़ी है, विशेषकर राज्यसभा चुनावों के दौरान, जहां सत्ताधारी और विपक्षी दलों के बीच गहरी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। इन राजनीतिक उठा-पटक के बीच, एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी ने आम आदमी की आर्थिक स्थिति को कमजोर कर दिया है,

Mohd Zeeshan Raza Khan··1 मिनट
संसद और देश की राजनीति: संवाद, बहस और जिम्मेदारी का मंच
संपादकीय

संसद और देश की राजनीति: संवाद, बहस और जिम्मेदारी का मंच

भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में संसद केवल कानून बनाने की संस्था नहीं है, बल्कि यह जनता की आवाज़ और लोकतांत्रिक मूल्यों का सबसे बड़ा मंच भी है। संसद के भीतर होने वाली बहसें, फैसले और नीतियां सीधे तौर पर देश की दिशा और जनता के जीवन को प्रभावित करती हैं। इसलिए संसद का सुचारु और सार्थक संचालन किसी भी लोकतंत्र की मजबूती का महत्वपूर्ण आधार होता है।

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट
कतारों में खड़ा भारत – नोटबंदी से कोरोना तक आम नागरिक की अनकही कहानी
संपादकीय

कतारों में खड़ा भारत – नोटबंदी से कोरोना तक आम नागरिक की अनकही कहानी

भारत की तस्वीर सिर्फ उसकी तरक्की, विकास और उपलब्धियों से नहीं बनती, बल्कि उन संघर्षों से भी बनती है जिन्हें आम नागरिक रोज़ जीता है। बीते कुछ वर्षों में देश ने ऐसे दो बड़े दौर देखे, जब सड़कों से लेकर अस्पतालों तक सिर्फ एक ही चीज़ नजर आई—लंबी कतारें। ये कतारें सिर्फ इंतज़ार की नहीं थीं, बल्कि बेबसी, उम्मीद और जंग की प्रतीक बन गईं।नोटबंदी हो, कोरोना हो, महंगाई हो या प्राकृतिक आपदाएं—इन सभी ने यह दिखा दिया कि भारत की असली ताकत उसकी जनता है। कतारें भले ही खत्म न हों, लेकिन उन कतारों में खड़ा हर इंसान उम्मीद और हिम्मत का प्रतीक है। यही वह जज़्बा है जो हर मुश्किल के बाद भारत को फिर से खड़ा कर देता है।

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट
“आज़ादी के बाद बदली पहचान: क्या हम ‘भारतीय’ से ‘हिंदू-मुस्लिम’ बन गए?”
संपादकीय

“आज़ादी के बाद बदली पहचान: क्या हम ‘भारतीय’ से ‘हिंदू-मुस्लिम’ बन गए?”

भारत का इतिहास सिर्फ संघर्ष और बलिदान की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साझा पहचान की भी कहानी है, जिसने सदियों तक विभिन्न धर्मों, भाषाओं और संस्कृतियों को एक सूत्र में बांधकर रखा। एक समय था जब हम सभी “भारतीय” थे—एक ऐसी पहचान जो हर भेदभाव से ऊपर थी। लेकिन आज़ादी के बाद, क्या हमने उस एकता को कहीं खो दिया?

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट
जनता कर्फ्यू के 6 साल: खामोशी ने जो सिखाया, क्या हम उसे भूल गए?
संपादकीय

जनता कर्फ्यू के 6 साल: खामोशी ने जो सिखाया, क्या हम उसे भूल गए?

छह साल पहले का वह दिन आज भी यादों में ताज़ा है, जब पूरा देश अचानक थम गया था। ‘जनता कर्फ्यू’ के नाम पर शुरू हुई यह पहल जल्द ही एक लंबे लॉकडाउन में बदल गई, जिसने न केवल हमारी दिनचर्या को बदला बल्कि सोचने का नजरिया भी बदल दिया।

··2 मिनट
शहीद दिवस – देशभक्ति, बलिदान और अमर गाथाओं का दिन
संपादकीय

शहीद दिवस – देशभक्ति, बलिदान और अमर गाथाओं का दिन

भारत की आज़ादी केवल कुछ नामों की कहानी नहीं है, बल्कि यह हर धर्म, हर वर्ग और हर क्षेत्र के लोगों के बलिदान की गाथा है। शहीद दिवस हमें उन सभी वीरों को याद करने का अवसर देता है, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए—चाहे वे किसी भी धर्म या समुदाय से क्यों न रहे हों।

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट
“सज़ा-ए-ज़िंदगी से राहत: हरीश राणा की खामोश पुकार”
संपादकीय

“सज़ा-ए-ज़िंदगी से राहत: हरीश राणा की खामोश पुकार”

कभी-कभी जीवन केवल जीवित रहने का नाम नहीं रह जाता, बल्कि वह एक लंबी, अंतहीन सज़ा में बदल जाता है। ऐसे क्षणों में मृत्यु का विचार भय नहीं, बल्कि मुक्ति जैसा प्रतीत होता है। हरीश राणा का मामला इसी कठोर सच्चाई की ओर हमारा ध्यान खींचता है।

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट
"रिश्वत: अन्याय से ‘अन्य आय’ तक का सफर"
संपादकीय

"रिश्वत: अन्याय से ‘अन्य आय’ तक का सफर"

लेख: समाज में न्याय और ईमानदारी को हमेशा सबसे बड़ी ताकत माना गया है। हर धर्म, हर संस्कृति और हर कानून यही सिखाता है कि गलत के खिलाफ खड़ा होना ही सच्ची इंसानियत है। रिश्वत लेना हमेशा से एक बड़ा अन्याय माना गया है, क्योंकि यह न केवल कानून का उल्लंघन है बल्कि नैतिक मूल्यों को भी कमजोर करता है।

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट
निजी स्कूलों की मनमानी से टूट रही मध्यम वर्ग की कमर कमीशन का खेल, महंगी किताबें और दबती प्रतिभाएं
संपादकीय

निजी स्कूलों की मनमानी से टूट रही मध्यम वर्ग की कमर कमीशन का खेल, महंगी किताबें और दबती प्रतिभाएं

सम्पादकीय लेख शिक्षा को हमेशा से समाज के विकास की सबसे मजबूत नींव माना गया है, लेकिन आज यही शिक्षा व्यवस्था मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए सबसे बड़ा आर्थिक संकट बनती जा रही है। निजी स्कूलों की मनमानी, लगातार बढ़ती फीस, और शिक्षा के नाम पर चल रहे कमीशन के खेल ने अभिभावकों को गहरी चिंता और बेबसी में डाल दिया है।

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