संपादकीय

"गुलामी की पुरानी सोच: जब 'विश्व गुरु' बनना 'विश्व चेला' बनने में बदल गया"

"हमने सदियों तक 'विश्व गुरु' बनने का सपना देखा था, लेकिन आज का भारत एक बार फिर उसी पुरानी मानसिकता में फंसता दिख रहा है। सोच वही है, चरित्र वही है—जहाँ गुलामी का इतिहास अभी भी जिंदा है, और चाटुकारिता की राजनीति ने एक बार फिर से जगह बना ली है। जब हम सावरकर जैसे प्रतीकों के बारे में सोचते हैं, तो हमें याद रखना होगा कि उनके विचार आज भी जीवित हैं, उनके वारिस नए चेहरे के रूप में सामने आ रहे हैं। यदि हमें सच में एक स्वतंत्र, प्रगतिशील राष्ट्र बनना है, तो हमें इस बंद मानसिकता को तोड़ना होगा और एक नई दिशा में कदम बढ़ाना होगा।"

Mohd Zeeshan Raza Khan··2 मिनट पढ़ने का समय
"गुलामी की पुरानी सोच: जब 'विश्व गुरु' बनना 'विश्व चेला' बनने में बदल गया"
विश्व गुरु' से 'विश्व चेला' बनने का विमर्श एक ऐसी बहस है जो औपनिवेशिक मानसिकता, चाटुकारिता और पुरानी सोच के बने रहने को रेखांकित करती है, जहाँ वैचारिक गुलामी आज के दौर में भी प्रासंगिक बनी हुई है यह तर्क दिया जाता है कि सोच, किरदार और गुलामी का रवैया वही है, बस समय के साथ पात्र बदल गए हैं "जब हम अपने इतिहास को देखते हैं, तो हमें स्पष्ट होता है कि 'विश्व गुरु' बनने का सपना सदियों का है, लेकिन आज हम उसी सपने के विपरीत दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं। वही सोच, वही चरित्र—जहाँ सत्ता में बैठे लोग पुरानी गुलामी के प्रतीकों का इस्तेमाल करते हैं और जनता को वही पुराने वादों से बहलाते हैं। सावरकर का उदाहरण, जो एक समय राष्ट्रीय जागरण के प्रतीक थे, आज उनकी सोच के नए वंशज हमारे सामने हैं। यह सिर्फ एक बदलाव नहीं, बल्कि चेतावनी है कि यदि हम सतर्क नहीं हुए, तो हम एक बार फिर वही पुरानी जंजीरों में बंध जाएंगे। हमें न केवल एक नए राष्ट्र का सपना देखना होगा, बल्कि अपनी सोच और मूल्य भी बदलने होंगे, ताकि स्वतंत्रता, समानता और सच्ची प्रभुत्वता का आदर्श स्थापित हो सके। तभी हमारा कल एक सशक्त और स्वतंत्र भारत होगा।"
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